Sunday, August 31, 2025
जय हो जानता कीदेश

खुल गई न्याय की देवी के आंख की मूर्ति,तलवार को जगह संविधान आया हाथ में

खुल गई न्याय के देवी की प्रतिमा की आंख

भारत बदल रहा है। नए भारत की न्याय की देवी की आंखें खुल गईं हैं। यहां तक कि उनके हाथ में तलवार की जगह संविधान आ गया है।कुछ समय पहले ही अंग्रेजों के कानून बदले गए हैं।

अब भारतीय न्यायपालिका (Indian Judiciary) ने भी ब्रिटिश के गुलामी युग को पीछे छोड़ते हुए नया रंगरूप अपनाना शुरू कर दिया है। सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) का ना केवल प्रतीक बदला है बल्कि सालों से न्याय की देवी की आंखों पर बंधी पट्टी भी हट गई है। जाहिर है कि सुप्रीम कोर्ट ने देश को संदेश दिया है कि अब ‘ कानून अंधा’ नहीं है।

दरअसल, ये सब कवायद CJI डी वाई चंद्रचूड़ (CJI DY Chandrachud) ने की है। उनके निर्देशों पर न्याय की देवी में बदलाव कर दिया गया है।

तलवार हिंसा और तराजू समानता का प्रतीक
CJI का मानना है कि तलवार हिंसा का प्रतीक है। जबकि, अदालतें हिंसा नहीं, बल्कि संवैधानिक कानूनों के तहत इंसाफ करती हैं। दूसरे हाथ में तराजू सही है कि जो समान रूप से सबको न्याय देती है।

इसलिए CJI चंद्रचूड़ के निर्देशों पर न्याय की देवी की मूर्ति को नए सिरे से बनवाया गया। सबसे पहले एक बड़ी मूर्ति जजेज लाइब्रेरी में स्थापित की गई है। यहां न्याय की देवी की आंखें खुली हैं और कोई पट्टी नहीं है, जबकि बाएं हाथ में तलवार की जगह संविधान है। दाएं हाथ में पहले की तरह तराजू ही है।

कहां से भारत में आई न्याय की देवी की मूर्ति?

17वीं शताब्दी में पहली बार इसे एक अंग्रेज अफसर भारत लेकर आए थे। ये अंग्रेज अफसर एक न्यायालय अधिकारी थे। ब्रिटिश काल में 18वीं शताब्दी के दौरान न्याय की देवी की मूर्ति का सार्वजनिक इस्तेमाल किया गया। बाद में जब देश आजाद हुआ, तो हमने भी न्याय की देवी को स्वीकार किया।

न्याय की देवी की वास्तव में यूनान की प्राचीन देवी जस्टिया हैं।  इनके नाम से जस्टिस शब्द बना था। इनके आंखों पर जो पट्टी बंधी रहती है। आंखों पर पट्टी बंधे होने का मतलब है कि न्याय की देवी हमेशा निष्पक्ष होकर न्याय करेंगी। किसी को देखकर न्याय करना एक पक्ष में जा सकता है। इसलिए इन्होंने आंखों पर पट्टी बांधी थी।

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