
राप्ती के सन्त फागूदास जी ,आचार्य डॉ. राधेश्याम द्विवेदी
भूमिका – डॉ.मुनि लाल उपाध्याय “सरस” जी ने अपने शोध प्रबंध: “बस्ती के छंदकार” में मध्योत्तर (तृतीय) ‘कलाधर- पाल-ब्रजेश चरण के कवि और छंदकार’ नामक अध्याय का नाम दिया है। “बस्ती जनपद के छंदकारों का साहित्यिक योगदान” भाग दो द्वारा 2008 में लेखक द्वारा प्रकाशित कराया गया है। इसमें केवल तीसरे अध्याय को सम्मिलित किया गया है। जिसका नामांकन मध्योत्तर चरण अथवा कलाधर- पाल-ब्रजेश चरण के नाम से किया गया है।
बीस कवियों काऐतिहासिक परिचय प्रस्तुत करते हुए उनके व्यक्तित्व तथा कृतित्व की संक्षिप्त समीक्षा प्रस्तुत की गई है। यह एक बेहतर संकलन बन पड़ा है। इसके अलावा18 छन्दकारों की सूची भी इसके पृष्ठ 233-34 में दी गई है जिनका पर्याप्त साहित्य न मिलने के कारण संक्षेप में सूचीबद्ध किया गया है। इन्हीं में से संत फागू दास जी एक सामान्य कवि रहे हैं। जिस पर बृहद शोध की पूर्ण अनुशंसा की जा रही है।
जीवन परिचय –
सिद्धार्थनगर जिले में चौखड़ा गांव और बाजार डुमरियागंज तहसील क्षेत्र में है। यह डुमरियागंज तहसील मुख्यालय से लगभग 5 किमी. दूरी पर स्थित है।
सन्त फागू दास जी का जन्म सं० 1962 विक्रमी को डुमरियागंज में राप्ती के पट पर पैदा होकर सन्त जीवन व्यतीत करते थे।
मन्दिर और समाधि –
मान्यता है कि संत फागू बाबा कहीं बाहर से आए और चौखड़ा में रह गए। यहां स्थित महाविद्यालय के पास उनकी समाधि है। यह भूमि पशुचर भूमि है। सन्त फागू दास जी के मृत्यु के बाद पेड़ के नीचे उनकी समाधि बना दी गई। जहां उनकी समाधि रखी गयी, वहां पहले सूखा था। समाधि बनने के बाद वह क्षेत्र हरा-भरा हो गया। प्रत्येक गुरुवार को वहां मेला लगने लगा था ।
फागू बाबा के निधन को 100 वर्ष अधिक हो चुके हैं। उनके समाधि स्थल पर हिंदू-मुस्लिम दोनों वर्ग के लोग आते हैं। 10 वर्ष पूर्व वहां विधायक निधि से कमरा बनवा दिया गया था जिसे कुछ लोगों ने मजार का स्वरूप देने का प्रयास किया था। इस तथा कथित मजार के रूप में हुए अतिक्रमण को स्थानीय विधायक के अनुरोध पर प्रशासन ने हटवा दिया है। यह गांव उत्तर में ‘बूढ़ी राप्ती नदी’ और दक्षिण में ‘राप्ती नदी’ के बीच के मैदानी इलाके में स्थित है। यह मां बटवासनी मंदिर (गलापुर) जाने वाले मार्ग पर पड़ता है।
धनाक्षरी और सवैया का उत्कृष्ट प्रयोग-
वे संतों और कवियों में से एक हैं जिनकी रचनाओं में धनाक्षरी और सवैया छंद का बहुत ही सुंदर और उत्कृष्ट प्रयोग देखने को मिलता है। इन छंदों का प्रयोग वे अपनी भक्ति, दर्शन और नीतिपरक बातों को कहने के लिए करते थे।इनके धनाक्षरी तथा सवैया छन्द बड़े उत्कृष्ट थे। छन्दों के बारे में “उपहार” पत्रिका में विशेष प्रशंसा की गयी है।
लेखक परिचय:-
(लेखक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, में सहायक पुस्तकालय एवं सूचनाधिकारी पद से सेवामुक्त हुए हैं। वर्तमान समय में उत्तर प्रदेश के बस्ती नगर में निवास करते हुए सम सामयिक विषयों,साहित्य, इतिहास, पुरातत्व, संस्कृति और अध्यात्म पर अपना विचार व्यक्त करते रहते हैं।)







