‘Justice is Due’ यानी ‘इंसाफ बाकी है,कैसे एक कानून ने एक निर्दोष की जान ले ली

‘Justice is Due’ यानी ‘इंसाफ बाकी है’.
अतुल सुभाष के आत्महत्या के बाद दहेज और घरेलू हिंसा के कानून में सुधार को लेकर चर्चा तेज हो गई है । अब तक घरेलू हिंसा का पीड़ित महिलाएं ही समझी जाती थीं लेकिन अब इस कानून के दुरुपयोग की चर्चा शुरू हो गई है। घरेलू हिंसा में एक तरह से पुरुष को ही दोषी मान लिया जाता है। महिला सशक्तिकरण के लिए बना यह कानून कही न कही पुरुष उत्पीड़न का माध्यम बन चला है। आज कोई ऐसा मोहल्ला नहीं होगा जहां एक दो घर इस कानून के शिकार न हो। कोर्ट रूम घरेलू हिंसा और दहेज के फाइलों से भर गया है। क्या इतने सारे मामले सब सच होते है नहीं कम से कम अतुल की आत्महत्या ने यह बात जाहिर कर दी। ऐसे न जाने कितने अतुल फर्जी मामले में कोर्ट के चक्कर काट रहे है।अब तो सुप्रीम कोर्ट ने भी मान लिया कि कानून का दुरुपयोग हो रहा है।
क्या है अतुल का मामला
आईटी पेशेवर अतुल सुभाष ने सोमवार 9 दिसंबर को बेंगलुरु में अपनी पत्नी और उसके परिवार पर उत्पीड़न का आरोप लगाते हुए आत्महत्या कर ली। अतुल अपने पीछे 24 पन्नों का एक सुसाइड नोट छोड़ा गया साथ ही एक वीडियो जिसमें उसने अपनी पत्नी के साथ-साथ ससुराल वालों और और एक न्यायाधीश पर ‘आत्महत्या, उत्पीड़न, जबरन वसूली और भ्रष्टाचार के लिए उकसाने’ का आरोप लगाया। मामले में उनकी पत्नी निकिता सिंघानिया, उनकी मां निशा, पिता अनुराग और चाचा सुशील के खिलाफ केस दर्ज किया गया है ।
वीडियो बनाते वक्त अतुल ने जो टीशर्ट पहनी थी, उसपर लिखा था- ‘Justice is Due’ यानी ‘इंसाफ बाकी है’। 24 पन्नों के सुसाइड नोट में अतुल ने बताया कि निकिता और उसके परिवार वालों ने उनपर घरेलू हिंसा, हत्या, दहेज प्रताड़ना समेत 9 केस दर्ज करवा दिए थे। अतुल ने 24 पन्नों के सुसाइड नोट के हर पन्ने पर ‘न्याय मिलना चाहिए’ लिखा है। पत्नी निकिता और ससुराल वालों के साथ-साथ सुभाष ने जौनपुर में एक पारिवारिक न्यायालय के जज पर भी उनकी सुनवाई न करने का आरोप लगाया।
इसमें परिजनों से कहा गया है कि न्याय मिलने तक उनकी अस्थियों को विसर्जित न किया जाए। नोट में चार साल के बेटे के लिए भी एक संदेश था जिसे अतुल से अलग रखा गया था। नोट में अतुल ने अपने माता-पिता को उनके बच्चे की कस्टडी देने की भी मांग की। नोट और वीडियो का लिंक एक एनजीओ के व्हाट्सएप ग्रुप पर भेजा गया था, जिससे अतुल जुड़े हुए थे।
सॉफ्टवेयर इंजीनियर अतुल सुभाष की खुदकुशी का मामला तूल पकड़ रहा है। इसी बीच भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ ने फैमिली लॉ में बड़े स्तर पर सुधार की जरूरत बताई है।
आखिर क्या हैं देश में दहेज कानून?
दहेज कुप्रथा को रोकने के लिए हमारे देश में कई कानून बनाए हैं। असहाय महिलाओं के खिलाफ हिंसा को कम करने के लिए कानून बनाने पर जोर दिया गया था। इसके चलते दहेज निषेध अधिनियम, 1961 बना। दहेज की मांग के बाद घरेलू हिंसा की घटनाएं भी सामने आती रही हैं ऐसे में ‘घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम 2005’ पारित किया गया।
इसके साथ ही पुरानी आईपीसी में दहेज उत्पीड़न और दहेज हत्याओं को रोकने के लिए कई प्रावधान किए गए थे। आईपीसी की धारा 498 दहेज से पहले और बाद में किसी भी रूप में उत्पीड़न को दंडनीय और गैर-जमानती बनाती है। 1983 में संसद द्वारा एक आपराधिक अधिनियम ‘आईपीसी 498 ए’ पारित किया था जो कहता था कि दहेज वसूलने के लिए की गई क्रूरता पर तीन या अधिक वर्षों की अवधि की सजा और जुर्माना देना होगा। दहेज उत्पीड़न और दहेज हत्याओं को रोकने के लिए आईपीसी 1961 में एक नई धारा ‘आईपीसी 304 बी’ जोड़ी गई। आईपीसी 304 बी में ‘दहेज हत्या’ का जिक्र है। भारतीय दंड संहिता की धारा 304 बी में कहा गया है कि अगर किसी महिला की शादी के सात साल के भीतर किसी भी जलने या शारीरिक चोट से मृत्यु हो जाती है या यह पता चला है कि उसकी शादी से पहले वह अपने पति या पति के किसी अन्य रिश्तेदार द्वारा क्रूरता या उत्पीड़न के संपर्क में थी। दहेज मांगने का संबंध तब महिला की मृत्यु को दहेज मृत्यु माना जाएगा। दहेज हत्या के लिए सजा सात साल के कारावास की न्यूनतम सजा या आजीवन कारावास की अधिकतम सजा है।
सुप्रीम कोर्ट ने दहेज कानूनों के दुरुपयोग पर जताई चिंता
कानून पारित होते ही दहेज उत्पीड़न के हजारों मामले दर्ज होने लगे। कई बार यह विवाहित महिला के लिए सुरक्षा के बजाय हथियार बन गया जिस पर समय-समय पर अदालतों ने भी चिंता जताई।
जस्टिस बीवी नागरत्ना व जस्टिस एन कोटिश्वर सिंह की पीठ ने कहा कि वैवाहिक विवाद से उत्पन्न आपराधिक मामले में सक्रिय संलिप्तता का संकेत देने वाले विशिष्ट आरोपों के बिना परिवार के सदस्यों के नाम का उल्लेख शुरू में ही रोक दिया जाना चाहिए। पीठ ने कहा कि यह एक सर्वविदित तथ्य है और न्यायिक अनुभव से प्रमाणित भी कि जब वैवाहिक कलह के कारण घरेलू विवाद उत्पन्न होते हैं, तो अक्सर पति के परिवार के सभी सदस्यों को फंसाने की कोशिश की जाती है। ऐसे में अदालतों को विशेष सावधानी बरतनी चाहिए, ताकि किसी कानून का दुरुपयोग कर किसी निर्दोष को न फंसाया जा सके।
यह पहली बार नहीं है जब न्यायालय ने धारा 498ए के दुरुपयोग पर चिंता व्यक्त की है। सितंबर में न्यायालय ने टिप्पणी की थी कि यह कानून सबसे अधिक दुरुपयोग किये जाने वाले कानूनों में से एक है। इससे पहले मई में सुप्रीम कोर्ट ने संसद से बीएनएस की संबंधित धारा में संशोधन करने का अनुरोध किया था। पत्नी द्वारा पति और ससुराल वालों के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 498ए के दुरुपयोग पर गंभीर चिंता जताते हुए सुप्रीम कोर्ट ने 3 मई को संसद से नए आईपीसी यानी भारतीय न्याय संहिता, 2023 (BNS) में आवश्यक बदलाव लाने का अनुरोध किया था। इसी साल लागू हुए बीएनएस में आईपीसी की धारा 498ए के जैसे प्रवधान बीएनएस की धारा 85 और 86 में शामिल किए गए हैं।
दहेज कानून के दुरुपयोग के बारे में आंकड़े क्या कहते हैं?
राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) दहेज उत्पीड़न के फर्जी मामलों के आंकड़ों को अलग से नहीं रखा जाता है। हालांकि, ब्यूरो 2014 से ‘दहेज निषेध अधिनियम, 1961’ के तहत झूठे मामले के रूप में अंतिम रिपोर्ट प्रस्तुत करने वाले मामलों पर डेटा इकट्ठा करता है। एनसीआरबी के अनुसार, 2022 के दौरान इस अधिनियम के तहत कुल 356 मामले सामने आए, जिनमें झूठे मामले के रूप में अंतिम रिपोर्ट प्रस्तुत की गई। साल 2021 में ऐसे 418 मामले सामने आए थे। 2020 में ये मामले घटकर 297 रह गए थे। पिछले कुछ वर्षों में 2019 ऐसा वर्ष रहा जब सबसे ज्यादा 462 झूठे मामले सामने आए।
अधिकतर मामले में निजी विवादों को दहेज और घरेलू हिंसा में बदल दिया जाता है। अतुल कोई एक मामला नहीं है ऐसे हजारों अतुल कोर्ट में तारीख ढोते अपनी जिंदगी बर्बाद कर रहे है।
खालिद (काल्पनिक नाम) बताते है कि पत्नी अक्सर परिवार से अलग होने का दबाव बनाती थी मना करने पर विवाद होने लगा और अंत में मामला दहेज और घरेलू हिंसा के रूप में न्यायालय में आ गया। पिछले 10 साल से कोर्ट के चक्कर लगा रहा हु।
रामू (परिवर्तित नाम) – पत्नी ने परिवार से अलग शहर में रहने का दबाव बनाया और बाद में घरेलू हिंसा का झूठा मामला बना कर घर के सभी सदस्यों पर मुकदमा दर्ज करवा दिया। मामला 15 साल से चल रहा है।
इस तरह से सैकड़ों मामले है । अक्सर परेशान करने के लिए बनाए जाते है। फिर भरी भरकम धन राशि वसूलने की कोशिश होती है जैसे अतुल के मामले में देखने को मिल।
शादी और फिर तलाक के नाम पर भरी धनराशि की मांग की जाने लगी है।
एक तरह से कानून के इस दुरुपयोग ने भारतीय परिवार व्यवस्था को तहसनहस कर के रख दिया है। एक पीड़ित ने बताया कि उनकी पत्नी से नहीं बनती वो हर बात पर जबरदस्ती करती है न मानने पर मुकदमा में फसाने की धमकी भी देती रहती है हालांकि उसका कहना है कि वो मजाक करती है लेकिन फिर भी डर लगा रहता है।

