
उत्तर प्रदेश के बस्ती जिले के कप्तानगंज विधान सभा मात्र विधानसभा नहीं पुर इतिहास समेटे है –
डॉ. राधेश्याम द्विवेदी
भारत सरकार अधिनियम 1935 के अनुसार, ब्रिटिश भारत में 1936-37 की सर्दियों में प्रांतीय चुनाव हुए थे । ये चुनाव तत्कालीन सभी ग्यारह राज्यपाल प्रांतों – मद्रास , मध्य प्रांत , बिहार , उड़ीसा , संयुक्त प्रांत (U P) , बंबई , असम , उत्तर-पश्चिम सीमा प्रांत , बंगाल , पंजाब और सिंध में हुए। ब्रिटिश प्रांतों दिल्ली , अजमेर-मेवाड़ , कूर्ग और बलूचिस्तान तथा रियासतों में चुनाव नहीं हुए थे।चुनाव के अंतिम परिणाम 20 फरवरी 1937 को घोषित किए गए थे। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस पांच प्रांतों – बंबई, मद्रास, मध्य प्रांत, संयुक्त प्रांत, उत्तर-पश्चिम सीमा प्रांत, बिहार और उड़ीसा – में सत्ता में आ गई थी। पंजाब, सिंध (जहां उसे बहुमत नहीं मिला), असम और बंगाल (जहां वह फिर भी सबसे बड़ी पार्टी थी) इसके अपवाद थे। अखिल भारतीय मुस्लिम लीग किसी भी प्रांत में अपने दम पर सरकार बनाने में असफल रही थी।
आजादी के पूर्व 1937- 39 में वर्तमान उत्तर प्रदेश का क्षेत्र ‘संयुक्त प्रांत’ कहलाता था, जहाँ हुए प्रांतीय चुनावों में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने स्पष्ट बहुमत हासिल किया था। कुल 228 सीटें थीं। इनमें हिन्दू की140 सीटें , (123 ग्रामीण,17 शहरी) और मुस्लिम की 64 सीटें, (51 ग्रामीण और 13 शहरी क्षेत्र) थीं। इसके अलावा 34 हिन्दू MLC (29 ग्रामीण 5 शहरी) 17 मुस्लिम (12 ग्रामीण और 5 शहरी) क्षेत्रों में भी चुनाव सम्पन्न हुए थे।कांग्रेस ने शानदार जीत हासिल करते हुए लगभग 1586 सीटों में से 706 सीटें जीतीं और सात प्रांतीय सरकारें बनाईं थी। उसने संयुक्त प्रांत, बिहार, मध्य प्रांत, बंबई और मद्रास में सरकारें बनाईं।
संयुक्त प्रांत (उत्तर प्रदेश)
संयुक्त प्रांत की विधानसभा में कुल 228 सीटें थीं। कांग्रेस ने शानदार प्रदर्शन करते हुए 133 या 134 सीटें जीतीं और पूर्ण बहुमत प्राप्त किया। बहुमत मिलने के बाद कांग्रेस ने यहाँ अपनी सरकार बनाई थी।
गोविंद वल्लभ पंत संयुक्त प्रांत के पहले प्रधानमंत्री (मुख्यमंत्री के समकक्ष) बने।
गोविंद बल्लभ पंत एक भारतीय स्वतंत्रता सेनानी और राजनीतिज्ञ थे, जो उत्तर प्रदेश के पहले मुख्यमंत्री बने। पंत ने 17 जुलाई 1937 को संयुक्त प्रांत के प्रधान मंत्री (समकक्ष मुख्यमंत्री)के रूप में शपथ ली। उन्होंने गृह, वित्त, सामान्य प्रशासन और वन मंत्रालय का प्रभार भी संभाला। यह मंत्रालय 1939 तक चला जब ब्रिटिश भारतीय प्रांतों में सभी कांग्रेस मंत्रालयों ने इस्तीफा दे दिया और प्रांतों को राज्यपाल शासन के अधीन कर दिया गया। कैलाश नाथ काटजू को कानून और न्याय मंत्री बनाया गया। रफी अहमद किदवई को वित्त विभाग की जिम्मेदारी सौंपी गई।
हालाँकि सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार की कांग्रेस की मांगें पूरी नहीं हुईं, फिर भी भारत सरकार अधिनियम 1935 ने मताधिकार प्राप्त लोगों की संख्या में वृद्धि की, जो भारत के अवर सचिव लॉर्ड लोथियन की अध्यक्षता वाली 1932 की लोथियन समिति रिपोर्ट की सिफारिशों के साथ – साथ वायसराय के मंत्रिमंडल और प्रांतीय सरकारों की सिफारिशों पर आधारित थी।

द्वितीय विश्वयुद्ध की घोषणा के विरोध में देशी सरकार का इस्तीफा –
भारतीय जनता के निर्वाचित प्रतिनिधियों से परामर्श किए बिना भारत को द्वितीय विश्व युद्ध में युद्धरत देश घोषित करने के वायसराय लॉर्ड लिनलिथगो के फैसले के विरोध में अक्टूबर और नवंबर 1939 में कांग्रेस सरकारों ने इस्तीफा दे दिया था।1945 में, ब्रिटिश लेबर सरकार ने प्रांतीय विधान मंडलों के लिए नए चुनाव का आदेशदिया। कांग्रेस ने संयुक्त प्रांतों में 1946 के चुनावों में बहुमत जीता और पंत फिर से प्रीमियर बने। भारत की आजादी (1947) और संविधान लागू होने से पहले, ब्रिटिश काल में 1946 में संयुक्त प्रांत (यूनाइटेड प्रोविंस) की विधान परिषद/विधानसभा के लिए चुनाव हुए थे।
कप्तानगंज क्षेत्र को आच्छादित करते हुए से अभी तक के प्रमुख विधायक:-
1937- रामचरित्र पांडेय (कांग्रेस)-
बस्ती जनपद में राजनीति की शुरुआत स्वतंत्रता के बाद राम चरित्र पांडेय और देशराज नारंग से होती है। दोनों बड़ी हस्तियां थीं। रामचरित्र पांडेय जहां कांग्रेस के बड़े नेता थे वहीं ,’महंत गोकुल चन्द नारंग’ देशराज नारंग औद्योगिक घराने से संबंध रखते थे। ऐतिहासिक अभिलेख ‘The Indian Year Book 1937-38’ के अनुसार, इस चुनाव में महंत (या सर) गोकुल चंद नारंग ने बस्ती जिला (पूर्वोत्तर/दक्षिण-पूर्व) और आस- पास के क्षेत्रों से प्रमुखता से भाग लिया और अपनी राजनीतिक वसामाजिक उपस्थिति दर्ज कराई थी। नारंग उद्योग समूह और इस औद्योगिक घराने की स्थापना का श्रेय डॉ. सर गोकुल चंद नारंग को जाता है, जिन्होंने वर्ष 1908 के आसपास इस औद्योगिक साम्राज्य की शुरुआत की थी। डॉ. सर गोकुल चंद नारंग अविभाजित पंजाब अब पाकिस्तान के एक बेहद विद्वान व्यक्ति, वकील और ब्रिटिश काल के मंत्री थे। उनके नेतृत्व में नारंग परिवार ने देश में चीनी मिलों आसवनी और वाइनरी के क्षेत्र में कदम रखा।
बड़े उद्योगपतियों में शुमार देशराज नारंग ने बस्ती को अपना कार्य क्षेत्र चुना था। यहां औद्योगिक क्रांति का बीज उन्होंने ही बोया था। जिला मुख्यालय पर रेलवे स्टेशन के निकट नारंग चीनी मिल की स्थापना की। इसकी दूसरी शाखा दस किमी दूर वाल्टरगंज बाजार के निकट वर्ष 1932 में स्थापित की। इस प्रबंधन ने अपनी तीसरी नई इकाई अठदमा रुधौली में भी स्थापित कर दी थी । ये चीनी मिलें तब उद्योग का हब मानी जाती थीं। इन मिलों से उत्पादित चीनी, गुणवत्ता के मामले में अव्वल मानी जाती रही।
राम चरित्र पांडेय स्वतंत्रता के बाद उत्तर प्रदेश के बस्ती जिले के एक बेहद कद्दावर और ऐतिहासिक कांग्रेस नेता थे, जिन्होंने जिले की शुरुआती राजनीति की दिशा तय की थी। वे मूल रूप से बस्ती जिले के हरैया तहसील अंतर्गत ‘बेलभरिया राम गुलाम’ गांव के रहने वाले थे। वह बेहद साधारण पृष्ठभूमि के एक जनप्रिय नेता थे। उस जमाने के जानेमाने उद्योगपति नारंग देशराज नारंग भी चुनाव लड़े थे। एक तरफ धनपति दो दूसरी तरफ एक धनहीन जमीन से जुड़ा नेता था। क्षेत्रीय बुजुर्ग बताते है की लाख प्रयास और चुनाव मे पानी की तरह पैसा बहाने के बाद भी देशराज नारंग चुनाव हार गए थे।
उनकी उद्योगपति देशराज नारंग के बीच राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता से मानी जाती है। उन्होंने एक बड़े ऐतिहासिक और चर्चित चुनाव में देशराज नारंग के परिवार से जुड़े बड़े औद्योगिक घराने के ” गोकुल चंद नारंग” को चुनाव में पराजित किया था। वह अपने समय में बस्ती में कांग्रेस के सबसे बड़े नेताओं में गिने जाते थे।वर्तमान में भारत सरकार के अमृत सरोवर अभियान के तहत उनके गृह ग्राम ‘बेलभरिया राम गुलाम’ में उनकी स्मृति को अक्षुण्ण रखने के लिए “स्वर्गीय पंडित राम चरित्र पांडेय स्वतंत्रता संग्राम सेनानी अमृत सरोवर” का निर्माण किया गया है।
1946 का प्रांतीय विधानसभा चुनाव –
आजादी से ठीक पहले जनवरी 1946 में उत्तर प्रदेश तत्कालीन संयुक्त प्रांत में प्रांतीय विधानसभा के चुनाव हुए थे। कांग्रेस ने संयुक्त प्रांत में शानदार जीत हासिल की और अपना बहुमत साबित किया। मुस्लिम लीग ने भी मुसलमानों के लिए आरक्षित सीटों पर काफी सीटें जीतीं।
1946- राधेश्याम शर्मा (कांग्रेस)
1946 के संयुक्त प्रांत (अब उत्तर प्रदेश) विधानसभा चुनाव में बस्ती जिले की कप्तानगंज (पूर्वी)-कम-बस्ती (पश्चिम) विधानसभा सीट से कांग्रेस के उम्मीदवार राधेश्याम शर्मा विधायक चुने गए थे। उनका मूल निवास पुरानी बस्ती के ओरियाना टोला / पांडे बाजार के समीप का क्षेत्र था।
राधेश्याम शर्मा के विरुद्ध हिंदू महासभा के प्रत्याशी दिग्विजय नाथ (गोरखनाथ पीठ के तत्कालीन महंत) को उतारा गया था। चुनावों में हिस्सा लेने के लिए अखिल भारतीय हिंदू महासभा के टिकट पर पर्चा जरूर भरा था, लेकिन उनका नामांकन पत्र अंग्रेज सरकार द्वारा खारिज हो गया था, जिसके कारण वे उस वर्ष का चुनाव लड़ ही नहीं सके थे।
दिग्विजयनाथ 1934 में गोरखनाथ मंदिर के महंत बने थे, और उन्हीं के बाद से यह मठ कट्टर हिंदुत्व की राजनीति का केन्द्र बना. दिग्विजयनाथ हिंदू महासभा के अध्यक्ष भी रहे।1939 में सभी पंथों, मंदिरों, मठों और साधु- संन्यासियों को एकजुट करने के लिए ‘अखिल भारतीय अवधूत भेष बारह पंथ योगी महासभा’ का गठन किया गया था। दिग्विजय नाथ आजीवन इस संस्था के अध्यक्ष रहे।
महात्मा गांधी के 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में भी महंत दिग्विजय नाथ काफी सक्रिय रहे।उनके ख़िलाफ़ अंग्रेज़ सरकार ने वारंट भी जारी किया था। महंत दिग्विजय नाथ ने 1944 में गोरखपुर में हिन्दू महासभा का आयोजन भी किया था । उनका नामांकन पत्र खारिज हो गया और वे चुनाव नहीं लड़ सके थे। इस प्रकार राधेश्याम शर्मा की जीत और आसान हो गई थी।1946 के इन प्रांतीय चुनावों के विजेताओं ने ही आगे चलकर भारत की संविधान सभा के सदस्यों का अप्रत्यक्ष रूप से चुनाव किया था।
1951-52 में आजादी के बाद प्रथम विधान सभा –
आजादी के बाद भारत ने लोकतांत्रिक व्यवस्था को मजबूत करने के लिए जनता को अपने प्रतिनिधि चुनने का अधिकार दिया। 1951-52 में हुए देश के पहले आम चुनाव के बाद उत्तर प्रदेश में पहली निर्वाचित विधानसभा का गठन हुआ, जिसने प्रदेश की लोकतांत्रिक राजनीति के एक नए दौर की शुरुआत की। 1952 के चुनाव में उत्तर प्रदेश विधानसभा की 430 सीटों के लिए चुनाव हुआ था।कुल 347 निर्वाचन क्षेत्रों में चुनाव कराया गया था।
इनमें 264 एक-सदस्यीय और 83 दो-सदस्यीय निर्वाचन क्षेत्र थे।चुनाव में कुल 2,604 उम्मीदवार मैदान में थे।चुनाव में कांग्रेस ने बड़ी जीत हासिल की और 388 सीटें जीतीं थीं । सोशलिस्ट पार्टी को 20 सीटें मिलीं थीं। बाकी सीटों पर अन्य दलों और निर्दलीय उम्मीदवारों ने जीत दर्ज की थीं ।चुनाव के बाद गोविंद बल्लभ पंत ने मुख्यमंत्री के रूप में सरकार का नेतृत्व किया था।
1952- कृपाशंकर श्रीवास्तव, कांग्रेस-
वर्ष 1952 के पहले विधानसभा चुनाव में कृपाशंकर श्रीवास्तव उत्तर प्रदेश के बस्ती जिले के अंतर्गत आने वाले हर्रैया पूर्व- बस्ती पश्चिम निर्वाचन क्षेत्र का प्रतिनिधित्व किया था।1952 में देश और उत्तर प्रदेश के पहले आम चुनावों के दौरान हर्रैया पूर्व (बस्ती पश्चिम) एक दोहरे सदस्य वाले निर्वाचन क्षेत्र के रूप में अस्तित्व में था। इस ऐतिहासिक चुनाव में कृपाशंकर श्रीवास्तव (भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस) ने सामान्य वर्ग से जीत हासिल की थी।
1952- दुखराम लाल ,कांग्रेस-
उस समय दो विधायक चुने गए थे। इस निर्वाचन क्षेत्र को ‘कप्तानगंज (उत्तर) सह नगर पूर्व’ कहा जाता था और यह एक ‘द्वि-सदस्यीय’ निर्वाचन क्षेत्र था, जहाँ से एक साथ दो विधायक चुने जाते थे। यह दोनों नेता एक साथ इस सीट से संयुक्त रूप से विजयी घोषित हुए थे और विधानसभा पहुंचे थे। वे दोनों एक ही दल से साथ में चुनाव जीते थे । दुखराम लाल ने इसी सीट से कांग्रेस के टिकट पर अनुसूचित जाति श्रेणी से जीत दर्ज की थी।
1952- राम लाल, कांग्रेस –
भारत के उत्तर प्रदेश की प्रथम विधानसभा सभा में विधायक रहे। 1952 उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनाव में इन्होंने उत्तर प्रदेश के बस्ती जिले के 288 – बस्ती (पश्चिम) विधान सभा निर्वाचन क्षेत्र से कांग्रेस की ओर से चुनाव में भाग लिया था। वे 1952- 57 के प्रथम विधान सभा के सदस्य थे। उन्होंने इस चुनाव में मुख्य प्रतिद्वंदी निर्दलीय उम्मीदवार राम गरीब को हराया था।
1952- प्रभु दयाल विद्यार्थी ,कांग्रेस –
वर्ष 1952 में यह दो सदस्यीय सीट थी, जहाँ से कांग्रेस के ही प्रभुदयाल विद्यार्थी भी दूसरे विधायक बस्ती पश्चिम से चुने गए थे।
1952-शिव नारायण, कांग्रेस –
वे हर्रैया पूर्व कम बस्ती पश्चिम के विधायक थे। उत्तर प्रदेश की प्रथम विधानसभा सभा में विधायक रहे। 1952 उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनाव में इन्होंने उत्तर प्रदेश के बस्ती जिले के 293 – हरैया (पूर्व) बस्ती (पश्चिम) विधान सभानिर्वाचन क्षेत्र से कांग्रेस की ओर से चुनाव में भाग लिया।
1957- कृपाशंकर , कांग्रेस –
कृपा शंकर 1957 का द्वितीय विधानसभा चुनाव में भी उन्होंने इस क्षेत्र में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की पकड़ मजबूत रखी और विधायक के पुनः चुने गए। बस्ती जिले के बस्तीपूर्व /’नगर’ विधान सभा निर्वाचन क्षेत्र से भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (INC) की ओर से चुनाव जीतकर विधायक चुने गए थे। नगर (Nagar) विधानसभा सीट (यह उस समय एक द्वि-सदस्यीय निर्वाचन क्षेत्र था, जहां से दो विधायक चुने जाते थे)। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस को 1957 के चुनाव में उन्हें 41,741 वोट मिले थे। उन्होंने इस चुनाव में मुख्य प्रतिद्वंदी निर्दलीय उम्मीदवार शकुंतला नायर को हराया था।1957 के चुनावों के दौरान यह बस्ती जिले के अंतर्गत बस्ती पूर्व विधान सभा सीट (वर्तमान में महादेवा/बस्ती निर्वाचन क्षेत्र के नाम से प्रभावित) के रूप में जानी जाती थी।
1962- शकुंतला नैय्यर (जनसंघ)-
शकुंतला नैय्यर (नायर) ने 1962 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में ‘भारतीय जनसंघ’ पार्टी के टिकट पर बस्ती जिले के ‘नगर’ विधानसभा निर्वाचन क्षेत्र से ऐतिहासिक जीत दर्ज की थी। उन्होंने कुल 17,352 वोट (38.56% मत प्रतिशत) हासिल किए और कांग्रेस के उम्मीदवार राम शंकर लाल को 1,931 वोटों के अंतर से हराया था।
1967- रामलखन सिंह (कांग्रेस)-
रामलखन सिंह वर्ष 1967 में उत्तर प्रदेश की बहादुरपुर (कप्तानगंज) विधानसभा सीट से भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (INC) के टिकट पर चुनाव जीतकर विधायक बने थे। रामलखन सिंह मूल रूप से बस्ती जिले के महुआडाबर के निवासी थे।उन्होंने इस क्षेत्र में अपनी मजबूत पकड़ बनाई थी। उन्होंने भारतीय जनसंघ के उम्मीदवार डी. बी. पाल को हराया था। इसके बाद राम लखन सिंह ने 1969,1974 के विधानसभा चुनाव में भी यहाँ से दोबारा विधायक चुने गए थे।
1969- रामलखन सिंह (कांग्रेस)-
1969 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में बहादुरपुर (बस्ती) सीट से कांग्रेस उम्मीदवार रामलखन सिंह ने भारतीय क्रांति दल के उम्मीदवार कृष्ण कुमार पाल को हराया था। इसके ठीक दो साल बाद 1969 में फिर से विधानसभा चुनाव हुआ। इस चुनाव में भी रामलखन सिंह को जीत मिली थी।
1974- रामलखन सिंह (कांग्रेस)-
1974 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में बस्ती जिले की कप्तानगंज विधानसभा सीट से कांग्रेस उम्मीदवार राम लखन ने संगठन कांग्रेस के जितेंद्र सिंह को हराया था।
1977- ओम प्रकाश उर्फ राम मिलन सिंह (जनता पार्टी)-
1977 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में बस्ती जिले की कप्तानगंज विधानसभा सीट से जनता पार्टी के उम्मीदवार ओम प्रकाश उर्फ राम मिलन सिंह ने चुनाव जीता था। उन्होंने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ( के प्रत्याशी राम लखन सिंह को हराया था।
1980- अंबिका सिंह (कांग्रेस)-
1980 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में कप्तानगंज (बस्ती) सीट से कांग्रेस (आई) के उम्मीदवार अंबिका सिंह ने जनता पार्टी (सेक्युलर) के उम्मीदवार सत्या राम को हराया था।
1985- अंबिका सिंह (कांग्रेस)-
अंबिका सिंह ने 1985 के कप्तानगंज विधानसभा चुनाव में लोकदल के उम्मीदवार राम प्रसाद चौधरी को हराया था। इससे पहले 1980 के चुनाव में भी कांग्रेस (आई) के टिकट पर उन्होंने जनता पार्टी के उम्मीदवार सत्य राम को हराया था।
1989- कृष्ण किंकर सिंह (निर्दल)-
वर्ष 1989 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में कप्तानगंज (बस्ती) सीट से निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में जीते राना कृष्ण किंकर सिंह ने जनता दल के उम्मीदवार सुखपाल पांडेय को हराया था।
1991- कृष्ण किंकर सिंह (निर्दल)-
वर्ष 1991 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में कप्तानगंज (बस्ती) सीट से निर्दलीय विजेता राना कृष्ण किंकर सिंह ने समाजवादी जनता पार्टी के उम्मीदवार राम प्रसाद चौधरी को हराया था।1989 और 1991 में लगातार दो बार यहां से निर्दलीय प्रत्याशी राणा कृष्ण किंकर सिंह जीते थे।
1993- राम प्रसाद चौधरी (सपा)-
1993 से लेकर 2012 तक लगातार पांच बार रामप्रसाद चौधरी इस सीट से विधायक चुने गए, कभी भाजपा से तो कभी सपा और बसपा से।कुर्मी बिरादरी में उन्हें “कुर्मी क्षत्रप” की उपाधि हासिल है और उनके परिवार ने बस्ती जिले को कई सांसद व विधायक दिए हैं। वर्ष 1993 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में कप्तानगंज (बस्ती) सीट से समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार राम प्रसाद चौधरी ने जीत दर्ज की थी। उन्होंने भारतीय जनता पार्टी के उम्मीदवार शीतला को हराया था।
1996- राम प्रसाद चौधरी (बसपा)-
1996 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में कप्तानगंज (बस्ती) सीट से राम प्रसाद चौधरी ने बहुजन समाज पार्टी के टिकट पर चुनाव जीता था और समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार महेश सिंह को हराया था।
2002- राम प्रसाद चौधरी (बसपा)-
2002 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में कप्तानगंज (बस्ती) सीट से भारतीय जनता पार्टी के उम्मीदवार राम प्रसाद चौधरी ने समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार महेश सिंह को हराया था।
2007- राम प्रसाद चौधरी (बसपा) –
वर्ष 2007 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में कप्तानगंज (बस्ती) सीट से बहुजन समाज पार्टी के उम्मीदवार राम प्रसाद चौधरी ने निर्दलीय उम्मीदवार कृष्ण किंकर सिंह राणा को हराया था।
2012- राम प्रसाद चौधरी (बसपा)-
2012 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में कप्तानगंज (बस्ती) सीट से बहुजन समाज पार्टी के उम्मीदवार राम प्रसाद चौधरी ने समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार त्रयम्बक नाथ त्रिपाठी को हराया था।
राम प्रसाद चौधरी के कार्य –
राम प्रसाद चौधरी कप्तानगंज विधान सभा सीट से 5 बार विधायक रह चुके हैं और तीन बार यूपी सरकार में उन्हे मंत्री का पद भी मिला था।रामप्रसाद चौधरी की पिछड़ी जाति के वोटरों में अच्छी खासी पकड़ हैं, इसलिए कुर्मी वोटरों के वे क्षत्रप नेता भी माने जाते हैं। कृषि महाविद्यालय की स्थापना पूर्व मंत्री राम प्रसाद चौधरी के द्वारा ही लाया गया था। इसके अलावा मानपुर माझा पर पुल, पंडुल घाट पुल, परखट्टी पूल, दुबौलिया ब्लॉक का गठन और भवन निर्माण सहित कई सड़कों का भी निर्माण कराया था। इसके बाद भी कप्तानगंज विकास के रेस में काफी पीछे छूट गया। रोजगार की दिशा में पूर्व मंत्री राम प्रसाद चौधरी ने कुछ काम नहीं किया, जिसका खामियाजा उन्हें वर्ष 2017 के विधानसभा में झेलना पड़ा।
2017- सीए चंद्र प्रकाश शुक्ल बीजेपी-
2017 के विधानसभा चुनाव में बस्ती जिले की कप्तानगंज सीट से भारतीय जनता पार्टी के उम्मीदवार सीए चंद्र प्रकाश शुक्ल ने जीत दर्ज की थी और उन्होंने बहुजन समाज पार्टी के उम्मीदवार राम प्रसाद चौधरी को हराया था।1993 से लेकर 2012 तक लगातार पांच बार रामप्रसाद चौधरी इस सीट से विधायक चुने गए, कभी भाजपा से तो कभी सपा और बसपा से। कुर्मी बिरादरी में उन्हें “कुर्मी क्षत्रप” की उपाधि हासिल है और उनके परिवार ने बस्ती जिले को कई सांसद व विधायक दिए हैं । 2017 में यह लंबा दबदबा टूट गया । भाजपा के चंद्र प्रकाश शुक्ला ने जीत दर्ज कर सीट पर पहली बार कमल खिलाया।
2022- काविंद्र चौधरी सपा –
2022 के विधानसभा चुनाव में कप्तान गंज सीट कुर्मी बिरादरी की सियासत के लिए जिले भर में खास पहचान रखती है। 2022 के चुनाव में भाजपा ने मौजूदा विधायक चंद्र प्रकाश शुक्ला पर फिर भरोसा जताया था।उनके सामने सपा ने काविंद्र चौधरी को उतारा था।कांग्रेस से अंबिका सिंह और बसपा से जहीर अहमद भी मैदान में थे।
दिलचस्प बात यह रही कि पूरे बस्ती जिले में सबसे ज्यादा मतदान इसी सीट पर हुआ था ,करीब 59.09 प्रतिशत, जो जिले की बाकी चारों सीटों से आगे था। पांच साल पहले 2017 में जिस सीट पर भाजपा ने पहली बार खाता खोला था, वहां सिर्फ एक ही कार्यकाल के बाद सत्ता पलट गई। साथ ही यह उस “कुर्मी क्षत्रप” राजनीतिक विरासत की भी वापसी मानी गई, जिस पर दशकों तक रामप्रसाद चौधरी के परिवार का असर रहा है।
2027- सबसे सशक्त वर्तमान विधायक कविंद्र चौधरी अतुल जी –
कविंद्र चौधरी (अतुल) उत्तर प्रदेश के बस्ती जिले की 308-कप्तानगंज विधानसभा सीट से समाजवादी पार्टी के वर्तमान विधायक हैं।वह वरिष्ठ नेता राम प्रसाद चौधरी के पुत्र हैं और उनकी राजनीतिक विरासत को आगे बढ़ा रहे हैं।
विधायक निधि से विभिन्न गांव और चौराहों को मुख्य मार्ग से जोड़ने की बात हो या छोटी-छोटी आबादी को कीचड़, गंदगी और जल जमाव से निजात दिलाने का प्रयास। विधायक ने अपने अब तक के कार्यकाल में अपनी निधि से यह छोटे-छोटे निरंतर प्रयास किए हैं।बहुत सारी जगह पर न सिर्फ छोटी सड़कों के निर्माण से लोगों को आवागमन में राहत मिली है, बल्कि अन्य कार्यों से भी लोग प्रभावित रहे हैं। आरसीसी, खड़ंजा, इंटरलाकिंग हाई मास्ट लाइट के साथ महापुरुषों की स्मृतियों में सहेजने में भी अपने मद का सदुपयोग किए हैं। बड़ी संख्या में पूरे विधानसभा क्षेत्र के प्रमुख चौराहों और स्थलों पर विभिन्न महापुरुषों को आमजन की यादों में जीवित रहने का कार्य किया गया है। विधायक कविंद्र चौधरी अतुल ने अपने स्वभाव और छवि को कभी नकारात्मक और विवादित नहीं बनने दिया।धार्मिक स्थलों के विकास के लिए भी प्रयास किया। कैंसर पीड़ित के उपचार में भी उन्होंने अपनी जिम्मेदारियां का निर्वहन करते हुए पांच लाख रुपए की सहायता उपलब्ध कराई। वर्ष 2023- 24 में पांच करोड़ की लागत से 44 विभिन्न सड़क, स्मृति द्वार, सीसी रोड, नाली निर्माण सहित अन्य प्रमुख कार्य करवाए गए।
2027 में भाजपा के लिए सबसे कठिन विधानसभा सीट कप्तानगंज –
कप्तानगंज में सपा के मौजूदा विधायक अतुल चौधरी (कविंद्र चौधरी) रामप्रसाद चौधरी के बेटे हैं। रामप्रसाद चौधरी यहां पहले कई बार विधायक रह चुके हैं और अब बस्ती लोकसभा से सांसद हैं। कुर्मी समाज में उनकी मजबूत पकड़ है। 2022 में अतुल चौधरी ने भाजपा के सीए चंद्र प्रकाश शुक्ला को करीब 24 हजार वोटों से हराया था। आज जब सपा-भाजपा की सीधी टक्कर हो रही है और त्रिकोणीय मुकाबला नहीं दिख रहा, तो पिछड़ा- दलित- अल्पसंख्यक का माहौल और भी चुनौतीपूर्ण बना हुआ है।दलित, कुर्मी और ब्राह्मण मतदाता निर्णायक भूमिका में रहते हैं। ऐसे में सिर्फ हवा-हवाई या नाम की ताकत से जीत मुश्किल है। प्रत्याशी को बूथ-बूथ पर संगठन मजबूत करना होगा, गैर-कुर्मी ओबीसी, ब्राह्मण और दलित वोटों को एकजुट करने की ठोस रणनीति बनानी होगी तथा स्थानीय मुद्दों पर लगातार सक्रिय रहना होगा।
2027 के भाजपा के कुछ संभावित प्रत्याशी –
1.सीए चंद्र प्रकाश शुक्ला भाजपा के सबसे सशक्त पूर्व विधायक –
चंद्र प्रकाश शुक्ला एक भारतीय राजनीतिज्ञ और उत्तर प्रदेश की 17वीं विधानसभा के सदस्य रहे हैं । वे उत्तर प्रदेश के कप्तानगंज निर्वाचन क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करते थे और भारतीय जनता पार्टी के सदस्य हैं। शुक्ला उत्तर प्रदेश की 17वीं विधानसभा के सदस्य रहे हैं।2017 से वे कप्तानगंज निर्वाचन क्षेत्र का प्रतिनिधित्व किए हैं और भाजपा के सदस्य हैं। 2017 के चुनावों में उन्होंने बहुजन समाज पार्टी के उम्मीदवार राम प्रसाद चौधरी को 6,827 वोटों के अंतर से हराया था । वर्ष 2017 के विधानसभा चुनाव में जीते भाजपा विधायक चंद्र प्रकाश शुक्ला ने कप्तानगंज को नगर पंचायत का दर्जा दिलाने में सफल रहे। कस्बे को जलजमाव से मुक्त कराने और पिपरौल घाट पर पुल बनवाने का वादा पूरा किया। राष्ट्रीय राजमार्ग से सटे विधानसभा क्षेत्र में ट्रामा सेंटर अभी भी आश्वासन की श्रेणी में ही है।कुछ वादे पूरे हुए हैं लेकिन सड़क शिक्षा पानी और बेरोजगारी के मुद्दे पर जनता के सवाल अभी भी मुखर हैं। कप्तानगंज दुबौलिया मार्ग पर वायरलेस चौराहे तक 1 किलोमीटर दोनों तरफ नाली व सीसी रोड बन जाने से जलजमाव से फिलहाल मुक्ति मिली, इसके साथ पिपरौल घाट पर पुल बनने से भटहा नारायणपुर सरवरिया सहित दर्जनों गांव के लोगों की राह आसान हो गई। 930 करोड़ की लागत से भाव फ्री विद्युत उप केंद्र पिपरौल घाट, सर्विया 1270 के पुलों का निर्माण 50 करोड़ से, बभनान गौरव एरिया मार्ग का निर्माण 23 करोड़ से, कप्तानगंज- दुबौलिया और मार्ग 15 करोड़ से, डिलीट से कप्तानगंज 21 करोड़ की लागत से दुगोला पचपेड़वा 6:







